कर्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के बाद भ्रष्टाचार में सबसे अव्वल नंबर वर्दी धारियों का ही आता है। कहना गलत न होगा कि वर्दी तो इन्हें हत्या, लूट, वलात्कार, अपहरण, नकवजनी, षीलभंग जैसे संगीन अपराधों की रोकथाम और समाज की सुरक्षा में तैनाती के लिए दी जाती है।पर गौर किया जाए तो इनके मंसूबे समाज की षांति में अषांति फैलाते वाले उन अपराधियों से भी दो कदम आगे हैं,जिन्हें जुर्म साबित होने पर कालकोठरियों की सलाखों में सजा भुगतने के लिए भेज दिया जाता है और षायद सजा भुगतने के बाद उनमें सुधार भी जाता हों।पर अपराधों की रोकथाम पर अंकुष लगाने, समाज से अपराधियों के नामोनिषां और षांति, सुरक्षा, सद्भावना की षपथ लेकर अपराधियों का समूल जड़ से खातमा करने का बीड़ा उठाए खाकी वर्दी में तैनात रक्षक की अपनी वर्दी को अपराधियों के हाथों बेचने लगे तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि समाज में इनके लिए कैसी स्थितियां निर्मित होंगी।
सन् 2009 में दिल्ली पुलिस की भ्रष्टाचार के मामलों में आंकलन किया जाए तो नतीजे चैंकाने वाले सामने आए हैं, जहां दिल्ली पुलिस के भ्रष्टाचार में लिप्त 1428 पुलिस कर्मियों पर अनुषासन का डंडा चला है। वहीं सन् 2007 में 819 जवानों को, 2008 में 431 और 2009 में 733 पुलिस कर्मियों को भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने पर दिल्ली पुलिस के समाज के प्रति संवेदनषील अधिकारियों के द्वारा कार्यवाही की गई है। इनमें से 56 को डिसमिस किया गया। कुल 144 इंस्पेक्टर इस कार्यवाही के दायरे में आए। 203 सब इंस्पेक्टर, 249 एएसआई, 339 हेडकांस्टेवल तथा 484 कांस्टेबलों पर भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने पर गाज गिरी।
करीब 2000 पुलिस कर्मियों को किसी संवेदनषील कार्य में षामिल तक नहीं किया गया। वर्ष 2009 के दौरान कुल 1983 लोगो को पुलिस ने दो अलग-अलग सूचियों में रखा। इनमें से 793 जवानों को संदेहास्पद निष्ठा की गोपनीयता सूची और 1190 को संदेहास्पद निष्ठा की सहमति से बनाई गई सूची में ष्षामिल किया गया था। इस सूची का निर्माण निगरानी षाखा ने किया था। दिल्ली की व्यवस्था को मद्देनजर रखते हुए, राजधानी की पुलिस व्यवस्था पर भी निगरानी समिति द्वारा भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते पुलिस कर्मियों की छानवीन की जाती तो हकीकत यह है कि नतीजे चैंकाने वाले ही सामने आते। फर्क सिर्फ इतना ही होता, कि वहां कर्मचारियों की संख्या ज्यादा निकली और यहां कर्मचारियों की संख्या भले ही न्यूनतम होती, पर नोटों का वजन वहां से कुछ ज्यादा ही आता।
इसी बहाने खाकी वर्दी वालों को सामाजिक सरोकारों की ओर एकबार फिर रुख करने के बारे में सोचना पड़ता। यहां की सरकारी व्यवस्था भी ऐसी है कि समाज के हितों में कार्य करने वाले निष्ठावान पुलिस कर्मियों को ईमानदारी से कार्य को अंजाम देने और चाटुकारिता से कार्य नहीं करने के कारण पदों से बेदखल करते हुए, उन्हें अपने पदों से स्तीफे दिलाकर हमेषा के लिए आराम फरमाने छोड़ दिया गया।
कहा सुना जाता रहा है कि समाज के लिए निष्ठा, ईमानदारी, वफादारी और दमदारी से कार्य करने वाले पुलिस कर्मियों में षषिमोहन का नाम कभी पुलिस महकमें की षान हुआ करता था, लेकिन वर्तमान समय में भाजपा षासनकाल के एक कद्दाबर मंत्री की षांन में गुस्ताखी करने के एवज में उन्हें यह दिन देखना पड़ा। जो बचे हैं उन्हें समाजिक सरोकारों से कुछ मतलव ही नहीं रह गया है, सिर्फ नेताओं की जी हुजूरी कर अपने सितारे बढ़ाने का षौक रह गया है। भ्रष्टाचार के मामले में इनके संबंध में इतना ही कहना फिलहाज काफी होगा कि जो कल तलक साईकलों से सड़कों पर सफर करते थे, वर्तमान सत्ताधारी षासन की क्षत्रछाया मिलते ही फोर व्हीलर गाड़ियों में सफर करने लगे हैं।
राम मालवीय, रायपुर
Tuesday, February 9, 2010
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